Sunday, 10 September 2017


         कुछ नज़्मे लाहौर से सरहद पार आयी हैं
          धूल सनी , प्यासी
          पूरा का पूरा  रेगिस्तान  लांघ आयी हैं
         
             ये जीने का हक़ मांगती हैं
           कुछ तो छूटा है इनका यहाँ
             क्यों भला ये रोज सरहदें लांघती हैं
           ये शाश्वत हैं , इनके आँसू रोज सूखे जाते हैं |
            उसी तपती रेगिस्तानी सरहद के इर्द-गिर्द
            सियासतों के अंकुर फूट जाते हैं
           
          सन सैंतालीस में जन्मी
          ये वे ही बूढी नज्मे हैं,
           जो अमृतसर में  गुनगुनायी गयी थी
          ये वही जवानियाँ हैं ,
          जो जंग-ए-आज़ादी में दफनाई गयी थी
          वे कहती हैं
           इतना फूटकर हम उस रात रोयी  थी
          गंगा भी उफनी , सिन्धु भी मचली
          सियासतें मगर उस रात भी सोयी थी



Friday, 25 August 2017

हरियाणा को फूंकने वाले लोगों को यदि कश्मीरी युवाओं कि याद दिलाई जाये तो यही लोग देशभक्त बन जाते हैं | इस दौरान ये लोग भूल जाते हैं कि देश भोगोलिक परिसीमाओं से नहीं वहाँ रह रहे नागरिकों से बनता है | कश्मीरियों के बिना कश्मीर जीतना वैसा ही है जैसा राम रहीम के समर्थकों का देशभक्त होना | जब एक देश अर्थात् उसके नागरिक अपनी आलोचना पर गौर करना बंद कर देते हैं तो इन परिस्तिथियों का आना स्वभाविक है | कल तक ये ही लोग कश्मीर जलाकर अपनी देशभक्ति सिद्ध करना चाह रहे होंगे और आज वो यही हरयाणा-पंजाब जलाकर कर रहे हैं | जब तक देश एसे लोगों से मिलकर बना है जो अपने खिलाफ कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं, तब तक इस देश में जाति-धर्म के नाम पर राजनीती को अनुचित ठहराना मूर्खता होगी |

तुम जलकर राख हो जाते हो
हम जलकर धुआं हो जाते हैं
ख़ुदा कि रहमत भी उन पर है अ-दोस्त ,
जो आग लगाकर रहनुमा हो जाते हैं 

Monday, 31 July 2017

हैवान, हाला, हवस सब आसमान से उतर आये थे
उन्ही रस्सियों के सहारे जो देव जन्नत छोड़ आये थे
पच्छिम का वह प्रभात मैंने देखा था
इंसान जब हैवानो सा दौड़ा था
ख़ुदा इंसानों कि बस्ती से भाग रहा था
कहते हैं उस वक्त इंसान जाग रहा था
ख़ुदा और उसका डर अब कहावतें थी
हर घर उस दिन ईद की दावतें थी
शराब के घड़ों से इंसानियत बहे जाती थी
सागर सब लबालब थे उससे
चाँद पर बैठी बुढिया ये बात कहे जाती थी

सब घेर खड़े हैं उसे , ख़ुदा बेड़ियों में जकड़ा है
इंसान कहता मैंने पकड़ा , हैवान कहते हमने पकड़ा है
चाँद वाली अम्मा कहती है..
           ख़ुदा कुछ बोलना चाहता है
तभी तेज आवाज में मौलवी अजान गाता है
बस्ती में एक और इंसान जागता है |




Saturday, 22 July 2017

जब मनिया गाँव से गुम  हुआ तो चौदह बरस का था | आज पूरे आठ साल बाद लौटा है  वही चेहरा, कद-काठी, नैन-नक्श सब वैसे ही तो हैं | सब मनिया को घेर खड़े हुए हैं और मनिया कह रहा है :
       मैं जब नींद से उठा तो एक अजीब देश में था | वहाँ की औरतों का सौन्दर्य देखते ही बनता था, बाल इतने घने और लम्बे कि जब चलती तो बुहारी आप ही लग जाती थी | कहते हैं,वहाँ जवानी के बाद वक्त और उम्र रुक जाती है |
 मेरे बाल मुंडवा कर एक नुक्कड़ पर रख दिए गये थे | ये बाज़ार था बालों का बाजार जहाँ कई देशों से लाये हुए   नाना तरह के बाल रखे हुए थे|  सुंदरियां उन्हें अपने  बालों में जोड़कर आइना देखती और फिर मुस्कुराकर एक गुच्छा उठा लेती | ये हसीन शैतानो का देश था--कांगरू देश |
          मनिया गमछा उठा अपने मुंडे माथे का पसीना पोंछते हुए बात पूरी करता है | चौपाल पर चुप्पी छाई हुई है यकायक एक चीख सुनाई देती है दीना की छोरी के बाल कट गये रे हाय अनर्थ हो गया अनर्थ | गाँव दीना के चौक में आ खड़ा हुआ है | सब मनिया कि तरफ घूरते हैं और मनिया कांगरू देश कि तरफ | मेरे  हाथ स्वतः  ही फेसबुक पर पोस्ट लिखने लग जाते हैं  मैं कांगरू देश कि उन हसीनाओं  को टैग करना चाहता हूँ पर मनिया कहता है वहाँ फेसबुक बैन है |

Tuesday, 6 June 2017

तुम जलकर राख हो जाते हो
हम जलकर धुआं हो जाते हैं
ख़ुदा की रहमत भी  उन पर है अ-दोस्त
जो आग लगाकर रहनुमा हो जाते हैं

अपना दिल महफ़ूज ना रख पाए
मेरा दिल चुराने की बात करते हो ?
अपना आंगन उजाड़ आये
ग़ैरों का संवारने कि बात करते हो ?
मुझे मिटाने का इरादा है ?
 तुम ही काफी थे  
पूरा शमशान क्यों लाये हो ?


Sunday, 4 June 2017

इस शहर कि परतें उधड रही हैं
और मुझ पर आ लिपटी हैं
नित नूतन होता यह,
अब चमकने लगा है
इसकी पुरानी ,जूठी  परतों तले दबा
मैं भी बदल सा गया हूँ
बदले मायने लेकर गाँव पहुँचता  हूँ
मेरा गाँव मुझे धिक्कार देता है
पहचानने से भी कतरा जाता है
मैं लौट आता  हूँ
इस शहर से एक और सौदा कर लेता हूँ 

Saturday, 20 May 2017

चलो नुक्कड़ नाटक देखने चलते है
पात्र क्या हैं ?
एक लोकतंत्र है दूसरा तानाशाह है
अद्भुत !
चलते हैं |
कुछ देर नौटंकी चलती है फिर अचानक दोनों पात्र तांडव नाचने लगते है | मैं लोकतंत्र को तानाशाह के साथ तांडव नाचता देखकर चकित हूँ , पूछता हूँ तो आइटम सॉंग का हवाला देकर चुप करा दिया जाता हूँ |
     अचानक नाचते-नाचते लोकतंत्र टूटकर तानाशाह कि बाँहों में गिर पड़ता है ! भीड़ में चुप्पी छा गयी है , मैं अकेले तालियाँ पीटता हूँ | मतदाताओं कि आहत भीड़ कुछ देर मुझे घूरती है फिर मुझ पर टूट पड़ती है और लोकतंत्र फिर जी उठता है !!
                    पर्दा गिरता है 

Tuesday, 2 May 2017


कस्तूरी मृग सी हो गयी है ज़िन्दगी
वो कहतें हैं  कि तुम  काबिल बहुत हो
और हम खुद  के इर्द-गिर्द भटक रहें हैं
||

मैं बेहतर  हो रहा  हूँ
तुम्हारे पैमानों से नापा जा रहा  हूँ
ये पैमाने ओछे हैं  
और  परिभाषाएं नंगी हैं
या फिर भद्दे रंगों से रंगी हैं
इन्हें धो कर सुखाओ
ये निश्चय ही फीकी पड़ जाएंगी
तले दबी सभ्यताएं फिर जाग जाएंगी
यक़ीनन , तुम सब मारे जाओगे
जन्नत-जहन्नुम आसमान से गिर पड़ेंगे
देव-दानव भी मारे जाएंगे
सब साफ़ सफ़ेद कफ़न ओढाए जाओगे
मैं बर्बाद हो दैत्य बन जाऊंगा...to be continued






अंतिम छोर कोसों दूर है
तुम्हारी पैमानों कि  परिसीमाओं से
aa

Saturday, 15 April 2017

बारूद भर कर पूछते हैं वो ,जलते क्यों हो ?
खैर करें वो ख़ुदा का ,हम फटते नही |
|
|
ग़र जल तुम रहे हो ,
तो तप हम भी रहे हैं |
तुम भी पलटो ,
हम भी पलटकर देखें
ये आग लगा कौन रहें हैं ?
|
|
मैं फैज़ हो जाऊं ,
मैं मंटो भी |
मैं दिनकर हो जाऊं ,
मैं शंकर भी |
बदलेगा वक़्त
सवाल वही होंगे
फिर होंगे मेरे जैसे कुछ और भी |
राहें बदलेंगी
राहगीर भी |
सच वही होंगे झूठ थे जो कल ,
झूठ होंगे जो कल भी
|
|
खुद से पूछना वही
जो मुझसे  पूछते हो |
फिर एक बार हम भी पूछेंगें
बर्खुरदार ,
तुम इतने सवाल क्यों पूछते हो ?



Thursday, 6 April 2017

आईनों से सजी दीवारें ,
अनन्त महत्वाकांक्षाएं ,
ताकती उम्मीदें
सब मुझे आ घेरे हैं
और मैं टुकड़ों में बंट गया हूँ |
ढलते सूरज ने मिसालें दी हैं
मैं फिर उठ गया हूँ |
इस बार दीवारें और मजबूत हो गयी हैं
सीसों की धूल झाड दी गयी है
पैरों को हल्का सा काट कर दौड़ की दूरी बढ़ा दी है
काल करम दोहरा रहा है
और मैं फिर कलम के इर्द-गिर्द बिखर रहा हूँ 

Tuesday, 4 April 2017

  भाई इतना जोर से क्यों गा रहे हो ? मैंने एक लौंडे से पूछा, जो कानों में earphone लगाये बेख़बर हो बहुत तेज़ गा रहा था |मैंने earphone लगा रखे हैं तो मुझे मेरी तेज आवाज सुनाई नही देती, वह बोला | पर आपने earphone क्यों लगा रखे हैं ? मुझ पर तंज कसते हुए बोला , श्रीमान आपको विदित हो बाहर शोर बहुत है अतः मैंने earphone लगाये हैं |  यकायक मुझे  कुछ कथित स्व्सत्यापित देशभक्त , कुछ वामपंथी , दक्षिणपंथी याद आ गये और अंग्रेजी शब्द hypocrisy की समझ भी |

Tuesday, 15 November 2016

आज पहली shortlist आई  थी
संगणक अभियांत्रिकी छोड़ सब में खामोसी छाई थी
यकायक pas पर एक और notification आया
प्रोफाइल पर सॉफ्टवेयर इंजिनियर ने फिर से कब्ज़ा जमाया
गुस्सा हुआ ,मैं  बहुत खिसियाया
हमारा विभाग औकात संग मुझे समझाने आया

अब नवंबर भी बीत गया
मैं shortlisted देखने को तरस गया
अगली shortlist में मैं शामिल था
सूट पहन निहारा शीशा
अब लगा मैं भी किसी काबिल था
और सब तो ठीक था
मुझे tell me about yourself नही आता था
यही सोच मन बेचैन हुआ जाता था
भोर में interviewer से साक्षात् हुआ 
सीधा linked list पूछा !
हम पर मानो वज्रपात हुआ 
वो कुछ बोले , हम कुछ बोले 
जो होना था उसका अहसास हुआ 

अब परिचय छोड़ हम coding पर बैठ गये 
सब ठीक रहा बस pointer हमसे ऐंठ गये 
बहुत लड़े पर coding से ना पार पाए थे 
अगले घंटे हम core पर लौट आये थे 
core ने शीघ्र ही रास्ता साफ़ किया 
ग्रेड शीट दिखा उसने भी मुझे विदा किया 

इससे ज्यादा बेइज्जती खुद की ना कर पाउँगा
मेरा स्वाभिमान रूठा तो कैसे उसे मनाऊँगा ...:P
आखिर किसी  जाल में हम भी फंसे
थोडा रोये खुद पर , थोडा हँसे  ||














Wednesday, 9 November 2016

अच्छा हुआ जो मोदी ने चाल चली
सदियों से बिछड़ी सखियाँ बैंक की कतार में मिली
दिखे आज कुछ शख्स भारी थैलों के संग
ज्यों कंधे पर हल रखे किसान बैलों के संग 
अब किस खेत को जोतेंगे ?
बिगड़ा है मानसून धरती बंजर सी हो गयी है
संदूक की चमकीली चाबी खंजर सी हो गयी है
गुप्ता जी बोले कसकर बांधो नाडा अब दंगे होंगे
हमें डर है ,
नोटों के बोझ से खिसकेगी पतलून और गुप्ता जी नंगे होंगे

Tuesday, 27 September 2016



गुणवत्ता से समझोता नही साब
घटिया ईमान बेचकर प्रतिष्ठा ना करानी ख़राब
डिमांड सप्लाई का लोचा है
इसीलिए पहले आपका सोचा है
दोपहर तक सूरज माथे चढ़ जायेगा
अभी ले लो साब, फिर भाव और बढ़ जायेगा

ये सज्जन तोलकर ईमानदारी बेच रहा था ..

ना ठगो हमें ..
हम अपने अधिकार जानते हैं
डिजिटल इंडिया का जमाना है
हर सरकारी योजना, सकल अर्थशास्त्र पहचानते हैं

साब लेना है तो लो अब थोड़ी ही बची है ...
ईमानदारी चीज़ ही एसी है ,
कालाबाजारी में भी खलबली मची है

ठीक है हम जरा गंगा हो आते हैं
पाप धो, तुम्हे निपटाते हैं
अरे सर ये घोर अपराध न करना
क्लीन गंगा चल रहा है ,
पाप उधर ना धोना ...
हमने फ्रंट पेज पर समाचार दिया है
कल ही गंगा का गोमूत्र से उपचार किया है
गोमूत्र से याद आया
कोई उचित मूल्य की गाय बताओ
भैंस ले लो साब , गाय दूध कम देती है
दूध क्यों !! जब गोमूत्र से दुनिया चलती है .....



गुणवत्ता से समझोता नही साब
घटिया ईमान बेचकर प्रतिष्ठा ना करानी ख़राब
डिमांड सप्लाई का लोचा है
इसीलिए पहले आपका सोचा है
दोपहर तक सूरज माथे चढ़ जायेगा
अभी ले लो साब, फिर भाव और बढ़ जायेगा

ये सज्जन तोलकर ईमानदारी बेच रहा था ..

ना ठगो हमें ..
हम अपने अधिकार जानते हैं
डिजिटल इंडिया का जमाना है
हर सरकारी योजना, सकल अर्थशास्त्र पहचानते हैं

साब लेना है तो लो अब थोड़ी ही बची है ...
ईमानदारी चीज़ ही एसी है ,
कालाबाजारी में भी खलबली मची है

ठीक है हम जरा गंगा हो आते हैं
पाप धो, तुम्हे निपटाते हैं
अरे सर ये घोर अपराध न करना
क्लीन गंगा चल रहा है ,
पाप उधर ना धोना ...
हमने फ्रंट पेज पर समाचार दिया है
कल ही गंगा का गोमूत्र से उपचार किया है
गोमूत्र से याद आया
कोई उचित मूल्य की गाय बताओ
भैंस ले लो साब , गाय दूध कम देती है
दूध क्यों !! जब गोमूत्र से दुनिया चलती है .....

Monday, 12 September 2016

गाँव


शहर-शोर छूटे हैं पीछे
धूप ने बदन भिगोया है
मुकर गयी हैं सड़कें ,
पगडंडियों ने फिर रास्ता दिखाया है
लगता है फिर कोई गाँव आया है

थोथी चमक मैली हुई
धुआं पार भी नज़र आया है
हर कली महकी है बाग़ की
दुश्मन भी मुस्कुराया है
लगता है फिर कोई गाँव आया है

किताब के पन्नों ने बिखेरी है खुशबू
बादलों ने बिन गरजे सावन बरसाया है
माटी महकी है सौंधी-सौंधी
कन्धों ने फिर से हल उठाया है
लगता है फिर कोई गाँव आया है


Thursday, 30 June 2016


                    काली घनी झुल्फों के नीचे ,
                   झुमका बड़ा जालिम है
                    मैं तो यूं ही लिख देता हूँ ,
                     वो ही असली ग़ालिब है | 
                     इस क़दर पनप रही हो 
                 ज़िन्दगी हो, या नफरत हो ?

             जो इश्क़ दरिया था तुम्हारा,तो दिल मेरा भी समंदर था 
             कमबख्त कई दरिया साथ समेटे था ||

                      " शुक्र है  ऐ खुदा तेरा जो तूने मुकद्दर मारा
                             जिंदगी को अब इरादों का साथ है "

                    " इश्क़ तो हमने भी बुलंदियों से किया
                      वफ़ादार मगर ठोकरें निकली "

                      वफ़ादार है मेरी तन्हाई
                      अक्सर मेरा साथ देती है

                       तुम नेक थे , ये धोखा था
                       हम एक हैं , ये भी धोखा है
                     
         
                      एक शख्सियत थी तुम्हारी
                      एक हस्ती थी हमारी
                      हम नूर की गलियों में  घूमा करते थे
                      तुम कलियों सी संवरा करती थी
                   
                   
                   
                   
                   

                       हम अदब से पेश आये
                     
                        अब मेरी तरफ देखो
                        ना चेहरे पे मेरे नूर है
                       और तुम जितना निखर रही हो
                       हम से तुम होकर उतना ही बिखर रही हो
                     

Tuesday, 14 June 2016



                                    "मैं मंज़िलों का पीछा करता रहा
                                     ज़िन्दगी रास्ता बनकर बीत गयी
                                     मैं ढूँढता रहा तेरी महक का सुरूर
                                     तू पूरी मधुशाला बनकर बीत गयी
                                      जब देखा पीछे मुड़कर तुझे
                                      तू यादें बनकर बीत गयी "


                                        मैं भी खाली हूँ , तू भी खाली है
                                        आ बैठ कुछ बातें करते हैं
                                        मेरे कंधे पर सिर टिका तू ,
                                        दोनों मिलकर कोई ख़्वाब बुनते हैं
                                        या कोई पहेली पूछ तू मुझसे ,
                                        दोनों मिलकर हल करते हैं
                                        जब पिछली बार मिली थी
                                        कुछ हल्की सी थी ,
                                        तुम्हारा बोझ बढ़ रहा है ?
                                        या तोलने के मायने बदल रही हो ?
                                        हर दिन अपना ठिकाना बदल देती हो
                                        किसी और से मोहब्बत कर लेती हो !
                                        हर रोज पुकारता हूँ
                                        क्यों हर रोज परिभाषाएं बदल लेती हो ?
                                       
                                   
                                     

                                    

Sunday, 1 May 2016



           जुदा होने का ये अंदाज़ क्या है ?
            ना खुशियाँ हैं ,ना आँसू हैं ,
             खाली सा ये पैग़ाम क्या है ?
            एक जूनून था यारों ,
             जब तुम्हारे साथ था
             तुम बिन कैसे हैं रास्ते ?
              तुम बिन अन्जाम क्या है ?

Sunday, 17 April 2016



     क्षितिज के उस पार ,
     जहाँ आसमान ढह रहा है
     मैं ज़िंदगियाँ ढूँढ रहा हूँ
     अँधेरे से लड़ेंगे जो भोर तक
     उन सितारों का अन्जाम ढूँढ रहा हूँ
     वाम है , दक्षिण है
     बीच का था जो पंथ उसका पैगाम ढूँढ रहा हूँ
     जला दिए गये जो सत्ताओं की आग में
     उन पर लगे इल्जाम ढूँढ रहा हूँ
    बनाये तो सब गये हैं
    स्वयंभू हो , वो हैवान ढूँढ रहा हूँ
    मार दिए गये सब भूमिपुत्र
    मैं ज़िन्दा कोई  हलधर ढूँढ रहा हूँ
    तुम कहते हो नश्वर है झूठ,
    तो शाश्वत है जो ,मैं वो सत्य ढूँढ रहा हूँ
    धारणाएं बदली , मनुज बदले
    मैं बदलाव के मायने ढूँढ रहा हूँ
    धुंधले हो चुके हैं सब ,
   खुद को देख पाऊं, वो आईने ढूँढ रहा हूँ
    बिखेर दी जो स्याही कलमों ने
    अब तक उसका मतलब ढूँढ रहा हूँ
    तुम जो कब से बैठे हो निःशब्द
   हाँ, मैं तुम्ही से कुछ पूछ रहा हूँ  |
        

Thursday, 14 April 2016




  तुम उतर आओ कविताओं में
  क्यों अब तक खड़ी हो ?
  अल्हड़ रात की चौखट पर
  एक कदम बढ़ो तो ,
 वीराने कानन में गूंजो तो
तुम शब्द बनकर मिलो कभी
मैं तैरूँगा तुम्हारे संग
प्रेम की नदियों में
कविताओं के सागर में
तुम थक चुकी हो ?!
मैं अनवरत सृजित हो रहा हूँ
कभी देखो चौखट के उस पार
मैं क्रंदन कर रहा हूँ
फिर से पुकारा है तुम्हे
आवाजें वापस लौट आई हैं
ये रात मुझसे बात नही करती ,
तुम्हारा ज़िक्र करता हूँ तो भाग जाती है
देखो फिर भाग खड़ी हुई
अब इसका पीछा मुश्किल हो गया है
बहुत चल लिया रेगिस्तान में
अब प्यास लगी है
कवितायेँ भी सूख गयी हैं ,
रसहीन हो चुकी हैं
अब तो तुम उतर आओ कविताओं में
क्यों अब तक खड़ी हो ?
 अल्हड़ रात की चौखट पर


Friday, 1 April 2016




                              विचार हैं ,
                              मुद्दे हैं ,
                             नूतन है ,
                             पुरातन है ,
                             हास्य है ,
                             क्रन्दन है ,
                             उपमाएं हैं ,
                              अलंकार हैं ,
                              कर्ता है ,
                              कर्म है ,
                        कविता गायब है ,
                        मैं ढूंढ़ता हूँ उसे ,
                        मुद्दों ,अलंकारों ,नवरसों की भीड़ में |
                        वो ना दूर जाती है , ना पास आती है !!
                         बस ,दूर खड़ी कुछ बेतुके गीत गाती है |

Monday, 14 March 2016



     जब तूफान थम जायेंगे
     जब वक्त की आंधियाँ धीमी पड़ जायेंगी
     जब अहसासों के बोल होंगे
     यादों का संगीत होगा,  
     तब कवितायेँ गायेंगी |

   ना डर होगा ,ना नादानी होगी
   बस खुशियाँ होंगी
   यादों का ईंधन होगा
   ग़मों की चिताएं होंगी ,
   तब कवितायेँ गायेंगी |

  आँखों  में पानी होगा
  अधर मुस्कुराएंगे
  लेखनी जीवंत रहेंगी
  नश्वर मर जायेंगे ,
  तब कवितायेँ गायेंगी |

 

 
 


Wednesday, 9 March 2016



                     भूल मत तू  ही प्रेरणा है तेरी ,
                     तेरे ख्वाबों पर अधिकार है तेरा |
                     कुछ आँखे उम्मीदों के आंसू लिए बैठी हैं ,
                     उन्हें बहने का मौका दे ,
                     गला लोहे को ,
                     पत्थर को पिघलने का मौका दे |
                     मत डाल पानी आग पर ,
                     पवित्र हो जाने दे ,
                      उन  ख़्वाबों को उम्मीदों की आग में जलकर |
               

Tuesday, 8 March 2016





                                                   
         
                                       उसकी यादें ताज से ज्यादा खूबसूरत थी  |
                                        उजड़े चमन में बहार आती थी ,
                                        जब वो हंसती थी |
                                        उसका तो क्रंदन भी निराला था ,
                                        हर एक आंसू उसका यमुना ने पाला था |
                                        एक दिन तो बवाल हो गया ,
                                        इतना रोयी मुमताज ,
                                        कि यमुना के जलस्तर में उछाल हो गया |

                                       ठहरिये जहाँपनाह ये कुछ ज़्यादा  हो गया !
                                       नहीं , नहीं!!
                                      तुम ही देख लो |
                                      ना मुमताज रही ,ना वो आंसू रहे |
                                     अब सूखी यमुना है ,
                                     उसके तट पर रोता , बुढ्ढा ताज है |
                                     ना मैं याद हूँ , ना मुमताज याद है ,
                                     तुम्हे पत्थर का ताज याद है |

                                     
                                  

Friday, 26 February 2016




             आज आँखे मूँद , कुछ गाँव देखें हैं सपनो में
              जो पीछे रह गये हैं ,दौड़ने की होड़ में ||

   
             गाँव की उस टूटी-फूटी सड़क पर चलती जीप में
              90 के दशक के गाने बजते होंगे आज भी  ?
             ओवरलोड जीप पर लटक सफ़र करते होंगे नौजवान ?
              आज भी  |
   
               चालक कमीज के दो बटन खुले रखता होगा ?
               उसके जेब में उछलते सिक्कों की छन्न-छन्न
                गानों के साथ घुलती होगी ?आज भी |

                बीडी पीकर बुजुर्ग जीप में धुआं छोड़ते होंगे |
                कोई शहर से लौटा बाबू , सिगरेट निकलकर
               कश खींचता होगा,  आज भी ?

               एक-दूसरे को देखकर लोग मुस्कुरा देते होंगे ?
               धूप उतनी ही तेज़ होगी ,
               उन पथरीले रास्तों पर चलती जीप के साथ
               उतनी ही तेज़ चलती होगी पवन ?
               आज भी ?
               

         
             
               


    

Thursday, 25 February 2016




                     दो चरित्र पाले  जा  रहे हैं ,
                     आदिकाल से !
                     परदे के दोनों तरफ ,
                     एक दूसरे से अनजान |
                     कब से  सींचे जा रहे हैं ,
                     विपरीत विचारधाराओं से |

                    विचारधाराएँ ?
                    जो पैदा की गयी हैं ,
                    हालातों का इस्तेमाल कर,
                    मनोदशाओं पर वार कर |

                     कब से बदलते रहें है ,
                     हालत !
                     बनाये गये हैं , बिगाड़े गये हैं
                     जानबूझकर ,स्वार्थों को निचोड़ कर |

                       फिर एक दिन टकरा जाते हैं |
                       दोनों चरित्र
                       पूर्ण विकसित
                       अपने-अपने मायनों में |
                       चिंगारियां अब तक निकल रही हैं ,
                       लपटों से घिरी ,
                       जली-भुनी सभ्यताओं की राख में
                       दो चरित्र फिर पाले जा रहे हैं ,
                       परदे के दोनों तरफ |
                       अन्नत काल तक !!
                         


                

Wednesday, 17 February 2016

साहब मीडिया खड़ा है बाहर ,
क्या जवाब दें?
आलाकमान का आदेश है,
खिलाफ बोला जाये |
साब हम सोचकर बोल दें ?
हमे लगता है विरोध गलत होगा |
अबे बच्चे हो तुम..
चुनावी रणनीति क्या जानो तुम ?
भुजबल हो भुजबल ही रहो तुम
ज्यादा सोचे तो बाहर कर दिए जाओगे,
बगावत के नाम पे लपेट लिए जाओगे |
और हाँ सुनो, कह देना..
ये देश का बच्चा-बच्चा बोल रहा है ,
हर लफ्ज़ को न्याय का तराजू तोल रहा है |
समझे??
हाँ सर समझ गये..
थोडा गला खरांस कर जयहिंद भी बोल देंगे
देशभक्ति के तवे पर हम भी रोटी सेक लेंगे |
"जयहिंद"

Tuesday, 9 February 2016

खिड़कियाँ अतीत की


                                                             

                                                             ??                                        ART WORK: BIPIN

                                               कुछ खिड़कियाँ पीछे खुली होंगी ,
                                               अतीत की तरफ भी |
                                                भविष्य आँका होगा,
                                                उनसे झांकते चेहरों ने भी !

                                                मैं भी पीछे झांकता हूँ ,
                                                वैसी ही खिडकियों से
                                                कुछ चेहरे दिखते हैं ,
                                                कोई भूत दिखता है |
                                                डरकर...
                                                पलटकर सामने देखता हूँ ,
                                                तो कुछ चेहरे डर जाते है ,
                                                पलट जाते हैं ,
                                                मुझे देखकर भी !!

                                       
                                               मैं भौंखला जाता हूँ ....
                                              और उधेड़ता हूँ परतें
                                              दंभ की ,घृणा की ,वहम की |
                                              फिर ठहर जाता हूँ ,
                                              शिथिल होकर ,
                                              वर्तमान की तरह
                                                 कर्महीन ||
                         

                                          

Thursday, 4 February 2016

कविता



                       कविता कहती है ...
                       मैं पल सकती हूँ
                       गुफाओं में खुले मैदानों में
                       पठारों में , पहाड़ों में
                       पिंजरे में खुले आसमान में
                       मैं पल सकती हूँ
                       सम में ,विषम में  |

                        बस .....
                        मैं उलझना नही चाहती
                        शब्दों के फेर में ,
                        गुमना नही चाहती
                        सृजन और विचार की चकाचौंध में
   
                        मैं, मैं नही रहूंगी फिर ,
                        फिर मैं विकृतियों से घिरी ,
                        शब्दों के जाल  में उलझकर
                        तेरा भ्रम रह जाउंगी |

                          ||

                                कुछ सोच कर
                                कुछ स्वीकार कर
                                कुछ नकार कर
                                कुछ चिल्ला कर
                                कुछ मौन रह कर
                                कुछ लकीरें पीट कर
                                कुछ लकीरें बना कर
                                कुछ बिखेर कर
                                कुछ इकट्टा कर ,
                                अनुभव बुनता हूँ मैं
                                ज़िन्दगी का पर्याय बुनता हूँ मैं |
                                इन्ही  अहसासों को गूँथ कर ,
                                कविता बुनता हूँ मैं |



Tuesday, 2 February 2016




 चलती गाड़ी के पहिये रुकते हैं , ऊंट बड़ी जोरदार आवाज के साथ सड़क किनारे बने हौज पर पानी पी रहा है | उसके पैरों की छाप , पहियों की लकीरों के साथ पीछे रह जा रही है |
ऊंट को हांकता गाड़ीवान मुझे देखकर एसे मुस्कराता है जैसे मुझे जानता हो , मैं भी मुस्कुराता हूँ | उसकी घनी सफ़ेद मूंछे हल्की मुस्कुराहट के साथ और भी बड़ी लगती हैं | ग्राम्य सड़क पर बहुत गड्ढे हैं ,गाड़ी बहुत हिल रही है ठीक उसी समाज की तरह जिसको नेतृत्व तो मिला है पर तह में पड़े गड्ढे बार-बार उसे हिला देते हैं |

()*
पिछली बार सड़क की नापनी हुई थी सड़क थोड़ी सी चौड़ी भी होनी थी !
फिर ?
वो ठेकेदार कह रहा था कि .....
कि ?
आगे क्या बतायें साब हमे खुद ही खबर पर भरोसा नही ..

सड़क की उत्तर वाले गाँव में चार बड़े अफसर हैं | वे शहर में रहते जरुर हैं पर गाँव के बड़े चहेते हैं | हों भी क्यों ना ? हर ** और बड़े धूर्त भी |
धूर्त !!
()**
अब बात जमीन की नही रही  बात ऊपर उठ चुकी है |
"साब बात इतनी हल्की ना है की इतनी आसानी से ऊपर उठ जाये "(वो बुड्ढा निरक्षर तो था पर शिक्षित था या जमीन ,जाति ,गाँव की सीमा से बंधी मानसिकता लिए था | ये मैं आप पर छोड़ता हूँ |)


Sunday, 31 January 2016

किस्मत


                            अभी किस्मत मिली थी तुम्हारी ,
                           अंधी , नादान, भटकी हुई ,
                            चिल्ला रही थी ,
                           पुकार रही थी , पुरुषार्थ को
                          और पुरुषार्थ अंगडाई ले  रहा था .
                          सपनो के रंगमंच पर |












                           

Tuesday, 26 January 2016



                      धीरे चढ़ ये सीढियां , मंजिल मिलने पर बहुत याद आयेंगी |
                        सहेज कर रख यादें हैं,  रूठ गयी तो बहुत रुलायेंगी  ||                    

                            जालिम हर बात  मुस्कुराकर पूंछते है,
                        उन्हें क्या मालूम इस दिल में सिर्फ गम बसते हैं ||

                     हमने पूछा उनसे ,तुम्हारा गाँव कितना ख़ूबसूरत है ?
                       जालिम ने  हमारी तरफ आईना घुमा  दिया ||

                     जुल्फों के समानान्तर टपकती लज्जा का
                      एक-एक कतरा मुझसे कहता ..
                       ओ शराबी रुक जा ,
                      उनके हुस्न से टकराकर तेरा रोम-रोम बहक जायेगा ,
                       पर बेपरवाह हम बढ़ते ही रहे इस आस में
                        की उनसे मिलकर जर्रा-जर्रा महक जायेगा ||
                         
                     उनकी नज़रें पलटकर वार करती रहीं |
                       हम खड़े रहे उनकी गली में और
                   हमारी आशिकी उनके दर पे तडपती रही ||

                   फिर वो आये बाहर ,तो चाँद का नूर शरमा गया |
                      उनकी आँखों का सुरमा देख,
                     क्षितिज तक फैला अँधेरा गहरा गया ||
       
         

                तुम्हे पाने की आस में , जर्रा-जर्रा उथल दिया|
               फिर भी ना मिले तुम ,
                                    तो वो बीज मुहब्बत हर जगह बिखेर दिया ||

                रूबरू ना हुए तुमसे हम ,तो क्या ?
                हमने तुम्हे कागज पर उकेर लिया ||
                               
       
                         

Friday, 22 January 2016

पहर



                                                                                   

ट्रेन पटरियों पर दौड़ रही है | छुक-छुक की आवाज सुनकर बौरा गया हूँ | थोड़ी देर में ही ये आवाज कर्णप्रिय हो जाती है | एक सपना माथे में भोर के सूरज की तरह निकलता है | सूरज की किरने ओंस की धवल बूंदों को सुनहरी बनाकर मिट्टी से लिपे हुए चौक पर गिर रही हैं | चौक से कुछ दूर कुछ अनपढ़ बुजुर्ग अख़बार के पन्ने पलट रहे थे | पन्नो पर उकेरे हुए चित्रों को देखकर ख़बरों का अनुमान लगा रहे हैं | एकमत ना होने पर कभी-कभी झगड पड़ते हैं |
धीरे-धीरे सूरज चढ़ रहा है |
संध्या हो चुकी है | गोधुली वेला में गायें घर लौट रहीं हैं | उनके पैरों से उडती धूल डूबते सूरज को और भी धुंधला बना देती है |खेत की मेड पर खड़ा होकर बच्चा हर बार दोगुने उत्साह से पतंग की डोर खींच रहा है , आने वाली रात से बेखबर |
छुक-छुक की आवाज बंद हो गयी हैं | हॉर्न बजता है , ट्रेन फिर से चल पड़ी है | मन पीछे भाग रहा है ट्रेन से दोगुना तेज | हाथ कलम लेकर कागज पर चलता है उस से भी तेज और दोपहर गायब है , नीरसता की तरह !

Monday, 11 January 2016

किसान




                     तुमने ना गाँव देखा , ना जानते हो
                    फिर कैसे किसान के हालात पहचानते हो ?
                    कभी देखी है किसान की औरत ?
                    देखा है उसका मैला आँचल ?
                    नही ना !,तो फिर क्यों ?
                    उस आँचल से बेदाग़ समाज मांगते हो ?

                 कभी जाकर देखो , कभी मिलकर देखो
                 कभी खेती के नशे में फंसकर देखो,
                     फिर उस नशे को उतार कर देखो

                उस गाँव का हर खेत एक मधुशाला है
                 हर शख्स मतवाला है ,
               हर गली मयखाने सी महकती है |
                फिर पड़ता है सूखा
              फिर हर मधुशाला अंगारे सी दहकती है
               जलती मधुशाला में किसी शराबी की औरत ,
                अपना स्वाभिमान ढूँढती है
              और उसकी रूह,
               दूर कही मुआवजे की फाइलों के नीचे तडपती है |
             

Wednesday, 9 December 2015

जादूगर


                                            
                                       बहुत सरल है दुनिया
                                     सीधे हैं रास्ते भी
                                    पर वो उनको बनायेंगे
                                    घुमावदार , जटिल ,कांटेदार भी
                 
                                    फिर रास्ता भटकेगी दुनिया
                                    फिर वो ही बनेंगे मार्गदर्शक भी !
                                     रास्ता दिखायेंगे
                                   कमायेंगे सहानुभूति , पैसा भी
   
                                     भोली है दुनिया ?
                                     या वों हैं जादूगर ?
                                    बुद्धिमान हूँ, सिर्फ मैं
                                   पर चलूँगा उन्ही रास्तों पर मैं भी
                                   " विद्रोही" बन नही पाऊंगा


                         

                          

Sunday, 1 November 2015


                      गाँव की भोर / अहसास 

                कुछ ढोर घुसे हैं खेत में
                टोर्च की रोशनी से देखना है ,
                आँखे काफी नही अँधेरा चीरने को |

                शांति पुंज फूट रहा है जर्रे-जर्रे से
                चुप्पी घोर , गहरी ,डरावनी है,
                बड़ा प्यारा है डर ,
                अहसास कराता है, अपने होने का |

                ट्रकों की आवाज सुनाई दे रही है
               चार कोस दूर हाईवे से ,
               दिन में नही देती ,
               सुना है दिन में अक्सर परिवेश शोर मचाता है |

               चुप्पी अहसास कराती है
               किसी के साथ का ,
               अकेलेपन का ,
               दोनों एक साथ ??

Saturday, 15 August 2015

आजादी


हवा हूँ तो क्या ?
महसूस तो करते हो ?
मेरे वेग को ,मेरी दिशा को !
धकेल सकती हूँ तुम्हे ,
विपरीत
तुम्हारी परिसीमाओं से बाहर |
बाँध सकती हूँ ,तुम्हे ,
तुम्हारी आजादी भी |
आखिर एक चिड़िया ही तो हो |
पिंजरे में कैद अतीत लिए हुए |

Friday, 3 July 2015


                                               हवा    
                 

                               

                               हवा खाली सी है ,सुनापन लिए हुए |
                                 किसी गाँव से गुजरी है ,अभी |
                                 रातें शांत होती हैं  वहाँ
                                 इस वक्त सो चुके होंगे सब |

                           
                                 कही सत्संग ,कही कुत्तों का  भौकना
                                        चुप्पी का अहसास कराता है |

                               
                                गाँव के अँधेरे से निकली है अभी ,
                                अभी राह भटक जाएगी
                                शहर की रोशनी से चोंधिया कर |
                                हर गली से समेट लेगी
                                पाप ,पुण्य ,हिंसा
                                शिक्षितों की शिक्षा |


                                पो फटे पहुचेगी अगले गाँव
                               सूनापन खोकर , कुछ साथ लेकर |
                             फिर आगे बढ़ जाएगी
                              सूरज को दिया दिखाकर ,
                              शहर की फीकी रोशनी फैलाकर |

                     
                            लेखनी भेद पूछती है
                             दोनों गाँवों में ,
                          और मैं घुमाता रहता हूँ उसे ,
                            शहर पर ,गोल -गोल |

                         






Friday, 12 June 2015

                 मुजरिम

     अब भी ज़िन्दा है ,
मुजरिम जो तूने पाला था
दीवारों तक ने सुनी थी उसकी चीखें ,
तेरे कानो के पार जाने को काफी नही ??
उसका स्वाभिमान मारा था ,
 तेरे दंभ ने |
मुजरिम पाला था तूने,
अपराध से बचने को |
दरारें दीवारों की आज भी बयां करती हैं ,
पीड़ा की गहराई |
वज्र से बना है तू ??
तो रोयेगा आज दधिची |
 दूर किसी बस्ती में ,
शहर के बीच , तेरे पुण्य के पीछे
आज भी जिन्दा है ,
मुजरिम जो तूने  पाला था |

Wednesday, 20 May 2015






अब भी लहराती है
पवन के स्वागत में
एकदम सूखी ,सुनहरी |
राह देखती है
किसी मेघ की
सदियों  से मिलने नही आया वो
हर बार तड़पा जाती है
बिन पानी वाली हवा
किसी जंग में मारा गया वो ??
आजकल रण जोरों पर है
या बेवफ़ाई कर गया ??
नही ,वो बरसेगा एक दिन
मुझे ना पाकर
फूटकर ,प्रलय लेकर
सबको डुबोने |
प्रीत का इम्तिहान है
हल की नोक उखाड़ देती है
समूल , पर
अब भी लहराती है
पवन के स्वागत में
एक दम सूखी ,सुनहरी |





Saturday, 11 April 2015





                   वो देख,
                कोई दरिंदा घात लगाये बैठा है
                  बच कर निकल |
                 नोच लेगा ,
                 जंगली जानवर है |
               शिकार भी नही कर पाएंगे हम ,
                    सरकारी घेरे में पला है |

                सहानुभूति मिलेगी ,
                  ज्यादा उम्मीद मत करना
                 गरीब देश में रहता हूँ |
              श्रद्धांजली भी देंगे ,
                वो भी डाक्यूमेंट्री बनाकर,
                पर रोक ना पायेंगे उनको
             कानून का चोला मजबूत है
               मेरी छुर्री से |

                    

Friday, 27 March 2015


                                 मुर्दा
             गीली लकड़ियाँ काटी हैं तुमने
                   अब मौका मुआयना होगा,
                मुर्दे पर जुर्माना होगा |

                 ये साला तो मर गया
                पीछे बवाल खड़ा कर गया |
               साहब मुर्दा है ये ,
             तुम्हे क्या बताएगा
              एक बार थाने ले चलो
           बड़े साहब को देख  मुर्दा भी जाग जायेगा |
       
                  बड़े साब ने कफ़न हटाया ,
                    मुर्दा फिर भी ना बडबडाया |

              मामला गंभीर है ,
                 मुर्दा अन्दर रखवाओ |
             A.C चलवाओ, दरवाजे पर दो गार्ड भी लगवाओ |
              मीडिया बुलाओ ,खबर छपवाओ,
             मुख पृष्ठ पर इनकी फोटू लगवाओ |

               
                 

Monday, 23 February 2015




                         आज देखते हैं ख़्वाब ,
                               जाने कब चेत जाएं ?
                       आज जीते हैं ज़िन्दगी ,
                         जाने कब मौत डराए ?
                       आज बनते हैं बादशाह ,
                         जाने कब जनमत बदल जाए ?
                     आज करते हैं मुहब्बत ,
                    जाने कब महबूबा रूठ जाए ?
                       आज लिखते हैं विप्लव ,
                     जाने कब लेखनी रूठ जाए ?

Thursday, 5 February 2015





                            इतना कैसे पचाते हो ?
                             क्या गोली खाते हो ?
                           कार में आते हो कार में जाते हो
                             फिर भी क्यों नेता कहलाते हो ?
                              क्या  ठण्ड में रोज नहाते हो ?
                             बारहवीं फ़ैल हो कोई बात नही |
                             पर घोटाले इतने जिनका कोई सुराख़ नही ?

                           साहब बोले ,,,,,,,,,,,,
                            तुम चुनते हो हमे बुनते हो |
                             तुम देते हो ,
                                      हम लेते हैं ||||||
                         उसे कानूनी रूप से वोट कहते हैं |


                       हम बोले ,.....
                          क्षमा करें देव ,वेद ,दर्शन ,अर्थ के ज्ञाता
                           अज्ञानी हैं हम ,हमे कुछ नही आता |
                         जनता चुग गयी खेत  अपना
                               क्यों आज देश पछताता???  

Sunday, 1 February 2015

                                                               पिरभू काका

पथरीले रास्ते पर साईकिल चलाते हुए तल्लीनता से अपनी अगली कहानी के बारे सोच रहा था |अभी कोई डेढ़ कोस दूर था वह गाँव जहाँ मुझे अपनी कहानी मिलने की उम्मीद थी |तल्लीनता टूटी गिरते-गिरते बचा था |कील घुसी थी ,अगले चक्के में |यहाँ से मुझे पैर घसीटने थे |

गाँव पहुँचते दोपहर हो चुके थे |जेठ की गरमी ,तपती धरती ,दोनों तरफ कच्चे ,भूसे से बने मकान ,कभी-कभी किसी घर से बच्चे को डांटने की आवाज सन्नाटे में गूंज पड़ती थी |
दूर कुछ बच्चे गुल्ली-डंडा खेल रहे थे |माथे के पसीने को कमीज से पोंछ कर गरमी को भूल जाते थे |मुझे अपनी तरफ आता देख सब खेलना छोड़ विस्मय से मुझे ताक रहे थे |मैंने पास जाकर पूंछा प्रभु काका को जानते हो ?
उपहास मिश्रित हंसी हँसकर ,एक दूसरे के कान में कुछ फुस-फुसियाकर दो बच्चों ने एक घर की तरफ इशारा किया |उस घर में रहता है पिल्भु (पिरभू )पंडित आपका काका |मुझे तुच्छ समझ बच्चे अपने खेल में लग गये |

भूसे व लकड़ियों से ढके घर में खाट पर जिन्दा मुर्दे से पिरभू काका लेटे थे |मुझे आता देख उठने की कोशिश की |
मैंने अपना परिचय दिया ,बताया मिश्र जी के कस्बे से आया हूँ |मिश्र ,नही जानते ? दामोदर मिश्र आपके पुराने दोस्त |
मिश्र जी से बहुत सुना था उनके स्वभाव के बारे में पुराने दिनों को याद करना आदत थी उनकी |
आदतन उन्होंने बोलना शुरू किया |बेटा ,लिखने का बहुत शौक था मुझे | लेखनी ही हमारी ज़िन्दगी थी| माँ-बाप के मना करने पर भी लिखता था |बगावत करने में जान बसती मेरी पर एक म्यान में एक ही तलवार आ सकती है सो भाग गया घर से |शहर में अपने गुजारे के साथ मैंने लेखन जारी रखा |चार बरस बीत गये ,गाँव की कमी मेरे लेखन में झलक रही थी |शहर में आने के बाद मनहूस लिखने लगा था ,बगावत की कल्पना भी अब सपना बन चुकी थी |पिता की डांट के बाद भी उनकी मर्जी के खिलाफ ,भोर के सूरज ,ढलती संध्या की उन्मुक्त हवा को महसूस कर लिखने का आनंद अब नही रहा था | लिखते वक्त माथा नफरत से भरा होता था |मुझे मेरी ही लेखनी  चिढाने लगी थी ,अब लग रहा था मैं कलम का नही बल्कि कलम मेरी गुलाम बन चुकी थी | मेरी लेखनी मुझसे ही बगावत कर बैठी,मैंने ही लड़ना  सिखाया था उसे|वो मेरी चंगुल से छूट, भाग खडी हुई |
मेरे घर से भागने के बाद घरवालों को हुई पीड़ा को मै अब जान सकता था |

  एक शाम गाँव पहुंचा,एक छोटा बच्चा मासूम सी हंसी हँसते हुए बोला "पिल्बू दादा आपकी माँ मर गयी "आप नही थे ना तो मंगल दादा ने उन्हें आग दी थी ,पहला मौका था ,जब जिन्दगी ने मुझे मौत दिखाई थी "|
बात पूरी कर काका भावशून्य हो गये थे पर आँखों के नीचे पानी की दो बूंदे काफी-कुछ बयाँ कर रही थी |

पिरबू काका बहुत मजबूत कलेजे के थे ,मेरी कल्पना से कही परे उन्होंने कहना जारी रखा |
मेरी मनाही के बाद भी कुछ बरसों बाद पिता जी ने शादी कर दी |अब परीवार पालने का बोझ था हम पर |बच्चों को पूरी तरह अपने वश में रखने की कोशिश करता था |डरता था की कहीं वो मुझे ना दोहरा बैठे |कुछ समय बाद पिता जी भी चल बसे |अब बीवी-बच्चों का मोह ही मुझे इस दुनिया से जोड़े रख रहा था |
एसे ही सात-आठ बरस गुजर गये |एक रोज पुराने दिनों की यादें मुझे फिर से उस राह पर दखेलने लगी |मैं एसे ख्यालों से भी दूर रहना चाहता था ,लेकिन जिन्दगी मौत को साथ लिए मेरे पीछे थी |मैंने आत्मसंतुष्टि के लिए फिर से लिखना शुरू कर दिया| घर में किसी को शिकायत नही थी मेरे लिखने से |धीरे-धीरे नशा बढता गया |मैं फिर से आज़ाद हवाओं को महसूस करने लगा था |आसपास के गावों में रुतबा बढने लगा |हर अगले दिन किसी नए आदमी से मिलना ,नए-नए मित्र बनाना मेरा स्वभाव सा हो गया था |परोक्ष रूप से घर की जिम्मेदारी बीवी-बच्चों पर थी |आमदनी के नाम पर खेतों की पैदावार थी |एक-दो बार भागवान ने टका दो टका कमाने की सलाह भी दी पर मेरे ऊपर चढ़ा भूत उसे टाल गया |अब मुझे किसी का टोकना अच्छा नही लगता था |
मैं शायद फिर से उस राह पर चल पड़ा था ,जिसका गंतव्य  दर्द था | 'प्यादे ते फर्जी भयो टेडो-टेडो जाय' अब चरितार्थ हो रही थी |मेरा जितना अपनों से कम हुआ उतना ही परायों से बढता गया |गाँव के लोग मेरे से बात करने से परहेज करते थे |मैं इन सब से दूर अपनी पुरानी नशेडी दुनिया में डूब गया था |

फिर महामारी आयी ,तांडव लेकर बच्चे-बुढ्ढे सब को एक लाठी से हांकती |मरीज़ को दस-बारह रोज ठण्ड लगती फिर मौत उसे अपने साथ ले जाती |शहर में उपचार संभव था ,ऊँची कीमतों पर | दोनों बच्चे व बीवी चपेट में आये थे |मैं तड़प रहा था पैसों के लिए ताकि उन्हें फिर से जिन्दगी दे सकूं पर कुछ ना कर सका |अपनी कृतियाँ एक-एक कर जलाता गया उनका मर्ज़ बढता गया ,फिर एक दिन वो भी सो गये मौत के आँचल में |
जिन्दगी ने मुझे मार दिया था ,एक बार फिर से |

काका कहे जा रहे थे ...
अब तो फिर से बचपन लौट आया है ,जिन्दगी के हाथों कई बार मरने के बाद,जानता ही नही मौत क्या है ,डर क्या है ?मर तो मैं पहले ही चुका था अब तो बस इन्तजार है उसका जिसको मैं पहचानता ही नही,लोग उसे मौत कहते हैं !!
मैं बाहर निकला ,देखा संध्या हो चुकी है |हवा में अजीब सी स्वच्छंद खुशबु है |लोग अपने घरों को लौट रहे हैं |सुदूर पिरबू काका लौटते दिख रहे हैं ,आज से कोई चालीस साल पहले ,जिन्दगी के हाथों मरने |



                     

Saturday, 17 January 2015




                   आज से कुछ सालों पहले अन्ना जी के साथ मिलकर किरण बेदी और अरविन्द केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम शुरु की थी | कोई समाधान नजर ना आने पर केजरीवाल ने नयी राजनैतिक पार्टी का गठन कर लिया ,अन्ना एंव बेदी को भी न्यौता दिया गया पर उन्हें ये अनुचित लग रहा था |दिल्ली में चुनाव हुए बेदी ने "आप" की आलोचना की पर जनता ने उसके प्रयास को सराहा | यहाँ तक सब ठीक था अब जब फिर से चुनाव होने जा रहे हैं तो बेदी ने बीजेपी ज्वाइन कर आप के खिलाफ लड़ना उचित समझा है |बीजेपी उस समय भी अस्तित्व में थी जब वो राजनीती से तौबा कर रहीं थी ,विरोध कर रही थी इसी पार्टी का | केजरीवाल की 49 दिन की सरकार ने कोई घोटाला नही किया ,फिर भी बेदी जी केजरीवाल के खिलाफ चुनावी जंग में हैं वो भी बीजेपी से !!! राजनीती से दूर रहकर केजरीवाल का विरोध पूरी तरह उचित था लेकिन ये कितना उचित है ??बीजेपी में घुसकर लड़ना |न्यौता तो उन्हें आप से भी मिला था वो भी पार्टी के नेतृत्व का |तब क्यों स्वीकार नही किया ??
इन सब सवालों के दो ही जवाब संभव हैं :1:चूंकि केजरीवाल ने उनके विचारों के खिलाफ राजनीती में दाखिला दिया और  दिल्ली में अच्छा प्रदर्शन कर उनके इगो को चोट पहुचाई है और वे (बेदी जी )अपने इगो को पहुची चोट का बदला केजरीवाल से व्यक्तिगत  रूप से लेना चाहती हैं |
2::किरण जी की नियति ठीक ना होना और यदि हो भी तो कब तक ?? चोरों के साथ रहकर कब तक साहूकारी करेंगी ?
यदि राजधानी की जनता इस बात को समझ पाती है तो किरण बेदी का बीजेपी ज्वाइन करना केजरीवाल के लिए फायदेमंद होगा ,हालांकि  काफी मुश्किल है :हम भारतीयों  की सोचने समझने की क्षमता कुछ ज्यादा ही बकैत है मेरे दायरे से बाहर |

Sunday, 11 January 2015



                             सपने है मेरे भी कुछ
                             पढ़-लिख समझ पता मैं भी ,
                                काश .......
                             तुमको , कौन हो तुम ?
                             जान पाता सरकार को |
                           पर तुम हो की छीन लेते हो ,
                           वजूद मुझसे मेरा |

                            मैं तो अनपढ़ हूँ
                         किसी और से सुनता हूँ ,
                           मेरी जमीन छिनने की खबर |
                            विकास खातिर ,
                             किसका ? किसकी कीमत पर ?

                        मुझे नही चाहिए
                            वह  सड़क,
                      जिस पर चलकर
                       खुर घिसते हों मेरे बैलों के |

                       नहीं चाहिए शाला वो
                        जिसमे पढ़ बच्चे मेरे
                    मेरा इतिहास दोहराते हों |
      



       भूमि  अधिग्रहण क़ानून 2013 में संशोधन (या बदलाव कहना उचित होगा ) करके किसानो की मर्जी के खिलाफ उनकी जमीन ली सकती है  ,लेकिन ये सब जनता के विकास हेतु किया जाएगा  | पांच एसे कार्यक्षेत्र हैं जिनके लिए जमीन की जरुरत पड़ने पर सरकार मालिक सहमति नही लेगी | जिनमे पांचवा है :
5:social infrastructure built under ppp(public private partnership)
पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप जिसमे पब्लिक का हिस्सा होगा ? जिसका एक उदाहरण देखने को मिलता है: indira gandhi international airport के निर्माण हेतु ली गयी जमीन |
जनता को बिजली ,शिक्षा  उपलब्ध करवाने हेतु किसानो की जमीन छिनी जा सकती है | बिजली, क्यों ? सिंचाई के लिए ! किसकी सिंचाई ? वो जमीन जो किसी निजी कंपनी के अधिकार में है ,लेकिन आप चिंतित मत होयिए आपको मुआवजा मिलेगा आपकी जमीन के बदले लेकिन शर्त है कीमत वही मिलेगी जो सरकार को उचित लगेगी | किसानो से PPP के नाम पर जमीन ली जाएगी तथा विकास हेतु विदेशी कम्पनीज को आमंत्रित किया जाएगा SEZ(special economic zone) के तहत |There were about 143 SEZs (as of June 2012) operating throughout India, by June 2013 this had risen to 173.[15] 634 SEZs have been approved for implementation by theGovernment of India (as of June 2012).[16]
(स्त्रोत wiki)
SEZ के तहत कम्पनीज को टैक्स में छूट मिलेगी ताकि वो इन्वेस्ट कर सकें जिससे देश का विकास होगा ,लेकिन अमरीका ,जापान जैसे विकसित देशों में ये कम्पनीज नही है |ओह्ह ! मैं भूल गया था की वो विकसित हैं उन्हें तो और विकास की जरुरत नही वहां किसान नही हैं जिनकी जमीन वो छीन सकें |
ये कम्पनीज अपने नियम खुद बनाती हैं तथा इनके किसी भी नियम में उस देश की सरकार का कोई हस्तक्षेप नही होगा |कंपनी के अधिकार में आने वाले क्षेत्र में हुए कोई भी अपराध में स्थानीय पुलिस दखल नही दे सकती (अपराध किसी भी दर्जे का हो :बलात्कार ,हत्या )|मतलब यदि कंपनी की फ़ौज के आदमी हमारे देश की किसी महिला का बलात्कार करें तो दोषियों को सजा कंपनी का कानून देगा लेकिन अच्छा है अपना तो कानून ही अँधा है |
मेरा आशय किसी सरकार पर आक्षेप करना नही है |मेरा बस एक सवाल है विकास किसका ? अमीरों का या गरीबों का या देश का ?वैसे अपने देश में तो गरीब बहुत हैं |किसानो का देश भारत विकासौन्मुख !


Monday, 29 December 2014



                                           नववर्ष
                       दीपक राग़  तू आज गा
                          कितनी बत्तियाँ नववर्ष पर जलाएगा ?
                         उस  झोले में फिर से दर्द समाएगा |

                      वो  भी पूजेंगे अपने देव को
                        फिर से आतंक पीठ सहालायेगा  |
                     गला भर्रायेगा , रूहें कापेंगी
                    शालाओं , सड़कों पर
                          फिर लाशें तांडव नाचेंगी |

                       फिर नववर्ष आएगा
                     फिर लहू टपकेगा लेखनी से
                      फिर उस झोले में  दर्द समा पायेगा ?