कविता कहती है ...
मैं पल सकती हूँ
गुफाओं में खुले मैदानों में
पठारों में , पहाड़ों में
पिंजरे में खुले आसमान में
मैं पल सकती हूँ
सम में ,विषम में |
बस .....
मैं उलझना नही चाहती
शब्दों के फेर में ,
गुमना नही चाहती
सृजन और विचार की चकाचौंध में
मैं, मैं नही रहूंगी फिर ,
फिर मैं विकृतियों से घिरी ,
शब्दों के जाल में उलझकर
तेरा भ्रम रह जाउंगी |
||
कुछ सोच कर
कुछ स्वीकार कर
कुछ नकार कर
कुछ चिल्ला कर
कुछ मौन रह कर
कुछ लकीरें पीट कर
कुछ लकीरें बना कर
कुछ बिखेर कर
कुछ इकट्टा कर ,
अनुभव बुनता हूँ मैं
ज़िन्दगी का पर्याय बुनता हूँ मैं |
इन्ही अहसासों को गूँथ कर ,
कविता बुनता हूँ मैं |
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