Sunday, 1 November 2015


                      गाँव की भोर / अहसास 

                कुछ ढोर घुसे हैं खेत में
                टोर्च की रोशनी से देखना है ,
                आँखे काफी नही अँधेरा चीरने को |

                शांति पुंज फूट रहा है जर्रे-जर्रे से
                चुप्पी घोर , गहरी ,डरावनी है,
                बड़ा प्यारा है डर ,
                अहसास कराता है, अपने होने का |

                ट्रकों की आवाज सुनाई दे रही है
               चार कोस दूर हाईवे से ,
               दिन में नही देती ,
               सुना है दिन में अक्सर परिवेश शोर मचाता है |

               चुप्पी अहसास कराती है
               किसी के साथ का ,
               अकेलेपन का ,
               दोनों एक साथ ??

Saturday, 15 August 2015

आजादी


हवा हूँ तो क्या ?
महसूस तो करते हो ?
मेरे वेग को ,मेरी दिशा को !
धकेल सकती हूँ तुम्हे ,
विपरीत
तुम्हारी परिसीमाओं से बाहर |
बाँध सकती हूँ ,तुम्हे ,
तुम्हारी आजादी भी |
आखिर एक चिड़िया ही तो हो |
पिंजरे में कैद अतीत लिए हुए |

Friday, 3 July 2015


                                               हवा    
                 

                               

                               हवा खाली सी है ,सुनापन लिए हुए |
                                 किसी गाँव से गुजरी है ,अभी |
                                 रातें शांत होती हैं  वहाँ
                                 इस वक्त सो चुके होंगे सब |

                           
                                 कही सत्संग ,कही कुत्तों का  भौकना
                                        चुप्पी का अहसास कराता है |

                               
                                गाँव के अँधेरे से निकली है अभी ,
                                अभी राह भटक जाएगी
                                शहर की रोशनी से चोंधिया कर |
                                हर गली से समेट लेगी
                                पाप ,पुण्य ,हिंसा
                                शिक्षितों की शिक्षा |


                                पो फटे पहुचेगी अगले गाँव
                               सूनापन खोकर , कुछ साथ लेकर |
                             फिर आगे बढ़ जाएगी
                              सूरज को दिया दिखाकर ,
                              शहर की फीकी रोशनी फैलाकर |

                     
                            लेखनी भेद पूछती है
                             दोनों गाँवों में ,
                          और मैं घुमाता रहता हूँ उसे ,
                            शहर पर ,गोल -गोल |

                         






Friday, 12 June 2015

                 मुजरिम

     अब भी ज़िन्दा है ,
मुजरिम जो तूने पाला था
दीवारों तक ने सुनी थी उसकी चीखें ,
तेरे कानो के पार जाने को काफी नही ??
उसका स्वाभिमान मारा था ,
 तेरे दंभ ने |
मुजरिम पाला था तूने,
अपराध से बचने को |
दरारें दीवारों की आज भी बयां करती हैं ,
पीड़ा की गहराई |
वज्र से बना है तू ??
तो रोयेगा आज दधिची |
 दूर किसी बस्ती में ,
शहर के बीच , तेरे पुण्य के पीछे
आज भी जिन्दा है ,
मुजरिम जो तूने  पाला था |

Wednesday, 20 May 2015






अब भी लहराती है
पवन के स्वागत में
एकदम सूखी ,सुनहरी |
राह देखती है
किसी मेघ की
सदियों  से मिलने नही आया वो
हर बार तड़पा जाती है
बिन पानी वाली हवा
किसी जंग में मारा गया वो ??
आजकल रण जोरों पर है
या बेवफ़ाई कर गया ??
नही ,वो बरसेगा एक दिन
मुझे ना पाकर
फूटकर ,प्रलय लेकर
सबको डुबोने |
प्रीत का इम्तिहान है
हल की नोक उखाड़ देती है
समूल , पर
अब भी लहराती है
पवन के स्वागत में
एक दम सूखी ,सुनहरी |





Saturday, 11 April 2015





                   वो देख,
                कोई दरिंदा घात लगाये बैठा है
                  बच कर निकल |
                 नोच लेगा ,
                 जंगली जानवर है |
               शिकार भी नही कर पाएंगे हम ,
                    सरकारी घेरे में पला है |

                सहानुभूति मिलेगी ,
                  ज्यादा उम्मीद मत करना
                 गरीब देश में रहता हूँ |
              श्रद्धांजली भी देंगे ,
                वो भी डाक्यूमेंट्री बनाकर,
                पर रोक ना पायेंगे उनको
             कानून का चोला मजबूत है
               मेरी छुर्री से |

                    

Friday, 27 March 2015


                                 मुर्दा
             गीली लकड़ियाँ काटी हैं तुमने
                   अब मौका मुआयना होगा,
                मुर्दे पर जुर्माना होगा |

                 ये साला तो मर गया
                पीछे बवाल खड़ा कर गया |
               साहब मुर्दा है ये ,
             तुम्हे क्या बताएगा
              एक बार थाने ले चलो
           बड़े साहब को देख  मुर्दा भी जाग जायेगा |
       
                  बड़े साब ने कफ़न हटाया ,
                    मुर्दा फिर भी ना बडबडाया |

              मामला गंभीर है ,
                 मुर्दा अन्दर रखवाओ |
             A.C चलवाओ, दरवाजे पर दो गार्ड भी लगवाओ |
              मीडिया बुलाओ ,खबर छपवाओ,
             मुख पृष्ठ पर इनकी फोटू लगवाओ |

               
                 

Monday, 23 February 2015




                         आज देखते हैं ख़्वाब ,
                               जाने कब चेत जाएं ?
                       आज जीते हैं ज़िन्दगी ,
                         जाने कब मौत डराए ?
                       आज बनते हैं बादशाह ,
                         जाने कब जनमत बदल जाए ?
                     आज करते हैं मुहब्बत ,
                    जाने कब महबूबा रूठ जाए ?
                       आज लिखते हैं विप्लव ,
                     जाने कब लेखनी रूठ जाए ?

Thursday, 5 February 2015





                            इतना कैसे पचाते हो ?
                             क्या गोली खाते हो ?
                           कार में आते हो कार में जाते हो
                             फिर भी क्यों नेता कहलाते हो ?
                              क्या  ठण्ड में रोज नहाते हो ?
                             बारहवीं फ़ैल हो कोई बात नही |
                             पर घोटाले इतने जिनका कोई सुराख़ नही ?

                           साहब बोले ,,,,,,,,,,,,
                            तुम चुनते हो हमे बुनते हो |
                             तुम देते हो ,
                                      हम लेते हैं ||||||
                         उसे कानूनी रूप से वोट कहते हैं |


                       हम बोले ,.....
                          क्षमा करें देव ,वेद ,दर्शन ,अर्थ के ज्ञाता
                           अज्ञानी हैं हम ,हमे कुछ नही आता |
                         जनता चुग गयी खेत  अपना
                               क्यों आज देश पछताता???  

Sunday, 1 February 2015

                                                               पिरभू काका

पथरीले रास्ते पर साईकिल चलाते हुए तल्लीनता से अपनी अगली कहानी के बारे सोच रहा था |अभी कोई डेढ़ कोस दूर था वह गाँव जहाँ मुझे अपनी कहानी मिलने की उम्मीद थी |तल्लीनता टूटी गिरते-गिरते बचा था |कील घुसी थी ,अगले चक्के में |यहाँ से मुझे पैर घसीटने थे |

गाँव पहुँचते दोपहर हो चुके थे |जेठ की गरमी ,तपती धरती ,दोनों तरफ कच्चे ,भूसे से बने मकान ,कभी-कभी किसी घर से बच्चे को डांटने की आवाज सन्नाटे में गूंज पड़ती थी |
दूर कुछ बच्चे गुल्ली-डंडा खेल रहे थे |माथे के पसीने को कमीज से पोंछ कर गरमी को भूल जाते थे |मुझे अपनी तरफ आता देख सब खेलना छोड़ विस्मय से मुझे ताक रहे थे |मैंने पास जाकर पूंछा प्रभु काका को जानते हो ?
उपहास मिश्रित हंसी हँसकर ,एक दूसरे के कान में कुछ फुस-फुसियाकर दो बच्चों ने एक घर की तरफ इशारा किया |उस घर में रहता है पिल्भु (पिरभू )पंडित आपका काका |मुझे तुच्छ समझ बच्चे अपने खेल में लग गये |

भूसे व लकड़ियों से ढके घर में खाट पर जिन्दा मुर्दे से पिरभू काका लेटे थे |मुझे आता देख उठने की कोशिश की |
मैंने अपना परिचय दिया ,बताया मिश्र जी के कस्बे से आया हूँ |मिश्र ,नही जानते ? दामोदर मिश्र आपके पुराने दोस्त |
मिश्र जी से बहुत सुना था उनके स्वभाव के बारे में पुराने दिनों को याद करना आदत थी उनकी |
आदतन उन्होंने बोलना शुरू किया |बेटा ,लिखने का बहुत शौक था मुझे | लेखनी ही हमारी ज़िन्दगी थी| माँ-बाप के मना करने पर भी लिखता था |बगावत करने में जान बसती मेरी पर एक म्यान में एक ही तलवार आ सकती है सो भाग गया घर से |शहर में अपने गुजारे के साथ मैंने लेखन जारी रखा |चार बरस बीत गये ,गाँव की कमी मेरे लेखन में झलक रही थी |शहर में आने के बाद मनहूस लिखने लगा था ,बगावत की कल्पना भी अब सपना बन चुकी थी |पिता की डांट के बाद भी उनकी मर्जी के खिलाफ ,भोर के सूरज ,ढलती संध्या की उन्मुक्त हवा को महसूस कर लिखने का आनंद अब नही रहा था | लिखते वक्त माथा नफरत से भरा होता था |मुझे मेरी ही लेखनी  चिढाने लगी थी ,अब लग रहा था मैं कलम का नही बल्कि कलम मेरी गुलाम बन चुकी थी | मेरी लेखनी मुझसे ही बगावत कर बैठी,मैंने ही लड़ना  सिखाया था उसे|वो मेरी चंगुल से छूट, भाग खडी हुई |
मेरे घर से भागने के बाद घरवालों को हुई पीड़ा को मै अब जान सकता था |

  एक शाम गाँव पहुंचा,एक छोटा बच्चा मासूम सी हंसी हँसते हुए बोला "पिल्बू दादा आपकी माँ मर गयी "आप नही थे ना तो मंगल दादा ने उन्हें आग दी थी ,पहला मौका था ,जब जिन्दगी ने मुझे मौत दिखाई थी "|
बात पूरी कर काका भावशून्य हो गये थे पर आँखों के नीचे पानी की दो बूंदे काफी-कुछ बयाँ कर रही थी |

पिरबू काका बहुत मजबूत कलेजे के थे ,मेरी कल्पना से कही परे उन्होंने कहना जारी रखा |
मेरी मनाही के बाद भी कुछ बरसों बाद पिता जी ने शादी कर दी |अब परीवार पालने का बोझ था हम पर |बच्चों को पूरी तरह अपने वश में रखने की कोशिश करता था |डरता था की कहीं वो मुझे ना दोहरा बैठे |कुछ समय बाद पिता जी भी चल बसे |अब बीवी-बच्चों का मोह ही मुझे इस दुनिया से जोड़े रख रहा था |
एसे ही सात-आठ बरस गुजर गये |एक रोज पुराने दिनों की यादें मुझे फिर से उस राह पर दखेलने लगी |मैं एसे ख्यालों से भी दूर रहना चाहता था ,लेकिन जिन्दगी मौत को साथ लिए मेरे पीछे थी |मैंने आत्मसंतुष्टि के लिए फिर से लिखना शुरू कर दिया| घर में किसी को शिकायत नही थी मेरे लिखने से |धीरे-धीरे नशा बढता गया |मैं फिर से आज़ाद हवाओं को महसूस करने लगा था |आसपास के गावों में रुतबा बढने लगा |हर अगले दिन किसी नए आदमी से मिलना ,नए-नए मित्र बनाना मेरा स्वभाव सा हो गया था |परोक्ष रूप से घर की जिम्मेदारी बीवी-बच्चों पर थी |आमदनी के नाम पर खेतों की पैदावार थी |एक-दो बार भागवान ने टका दो टका कमाने की सलाह भी दी पर मेरे ऊपर चढ़ा भूत उसे टाल गया |अब मुझे किसी का टोकना अच्छा नही लगता था |
मैं शायद फिर से उस राह पर चल पड़ा था ,जिसका गंतव्य  दर्द था | 'प्यादे ते फर्जी भयो टेडो-टेडो जाय' अब चरितार्थ हो रही थी |मेरा जितना अपनों से कम हुआ उतना ही परायों से बढता गया |गाँव के लोग मेरे से बात करने से परहेज करते थे |मैं इन सब से दूर अपनी पुरानी नशेडी दुनिया में डूब गया था |

फिर महामारी आयी ,तांडव लेकर बच्चे-बुढ्ढे सब को एक लाठी से हांकती |मरीज़ को दस-बारह रोज ठण्ड लगती फिर मौत उसे अपने साथ ले जाती |शहर में उपचार संभव था ,ऊँची कीमतों पर | दोनों बच्चे व बीवी चपेट में आये थे |मैं तड़प रहा था पैसों के लिए ताकि उन्हें फिर से जिन्दगी दे सकूं पर कुछ ना कर सका |अपनी कृतियाँ एक-एक कर जलाता गया उनका मर्ज़ बढता गया ,फिर एक दिन वो भी सो गये मौत के आँचल में |
जिन्दगी ने मुझे मार दिया था ,एक बार फिर से |

काका कहे जा रहे थे ...
अब तो फिर से बचपन लौट आया है ,जिन्दगी के हाथों कई बार मरने के बाद,जानता ही नही मौत क्या है ,डर क्या है ?मर तो मैं पहले ही चुका था अब तो बस इन्तजार है उसका जिसको मैं पहचानता ही नही,लोग उसे मौत कहते हैं !!
मैं बाहर निकला ,देखा संध्या हो चुकी है |हवा में अजीब सी स्वच्छंद खुशबु है |लोग अपने घरों को लौट रहे हैं |सुदूर पिरबू काका लौटते दिख रहे हैं ,आज से कोई चालीस साल पहले ,जिन्दगी के हाथों मरने |



                     

Saturday, 17 January 2015




                   आज से कुछ सालों पहले अन्ना जी के साथ मिलकर किरण बेदी और अरविन्द केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम शुरु की थी | कोई समाधान नजर ना आने पर केजरीवाल ने नयी राजनैतिक पार्टी का गठन कर लिया ,अन्ना एंव बेदी को भी न्यौता दिया गया पर उन्हें ये अनुचित लग रहा था |दिल्ली में चुनाव हुए बेदी ने "आप" की आलोचना की पर जनता ने उसके प्रयास को सराहा | यहाँ तक सब ठीक था अब जब फिर से चुनाव होने जा रहे हैं तो बेदी ने बीजेपी ज्वाइन कर आप के खिलाफ लड़ना उचित समझा है |बीजेपी उस समय भी अस्तित्व में थी जब वो राजनीती से तौबा कर रहीं थी ,विरोध कर रही थी इसी पार्टी का | केजरीवाल की 49 दिन की सरकार ने कोई घोटाला नही किया ,फिर भी बेदी जी केजरीवाल के खिलाफ चुनावी जंग में हैं वो भी बीजेपी से !!! राजनीती से दूर रहकर केजरीवाल का विरोध पूरी तरह उचित था लेकिन ये कितना उचित है ??बीजेपी में घुसकर लड़ना |न्यौता तो उन्हें आप से भी मिला था वो भी पार्टी के नेतृत्व का |तब क्यों स्वीकार नही किया ??
इन सब सवालों के दो ही जवाब संभव हैं :1:चूंकि केजरीवाल ने उनके विचारों के खिलाफ राजनीती में दाखिला दिया और  दिल्ली में अच्छा प्रदर्शन कर उनके इगो को चोट पहुचाई है और वे (बेदी जी )अपने इगो को पहुची चोट का बदला केजरीवाल से व्यक्तिगत  रूप से लेना चाहती हैं |
2::किरण जी की नियति ठीक ना होना और यदि हो भी तो कब तक ?? चोरों के साथ रहकर कब तक साहूकारी करेंगी ?
यदि राजधानी की जनता इस बात को समझ पाती है तो किरण बेदी का बीजेपी ज्वाइन करना केजरीवाल के लिए फायदेमंद होगा ,हालांकि  काफी मुश्किल है :हम भारतीयों  की सोचने समझने की क्षमता कुछ ज्यादा ही बकैत है मेरे दायरे से बाहर |

Sunday, 11 January 2015



                             सपने है मेरे भी कुछ
                             पढ़-लिख समझ पता मैं भी ,
                                काश .......
                             तुमको , कौन हो तुम ?
                             जान पाता सरकार को |
                           पर तुम हो की छीन लेते हो ,
                           वजूद मुझसे मेरा |

                            मैं तो अनपढ़ हूँ
                         किसी और से सुनता हूँ ,
                           मेरी जमीन छिनने की खबर |
                            विकास खातिर ,
                             किसका ? किसकी कीमत पर ?

                        मुझे नही चाहिए
                            वह  सड़क,
                      जिस पर चलकर
                       खुर घिसते हों मेरे बैलों के |

                       नहीं चाहिए शाला वो
                        जिसमे पढ़ बच्चे मेरे
                    मेरा इतिहास दोहराते हों |
      



       भूमि  अधिग्रहण क़ानून 2013 में संशोधन (या बदलाव कहना उचित होगा ) करके किसानो की मर्जी के खिलाफ उनकी जमीन ली सकती है  ,लेकिन ये सब जनता के विकास हेतु किया जाएगा  | पांच एसे कार्यक्षेत्र हैं जिनके लिए जमीन की जरुरत पड़ने पर सरकार मालिक सहमति नही लेगी | जिनमे पांचवा है :
5:social infrastructure built under ppp(public private partnership)
पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप जिसमे पब्लिक का हिस्सा होगा ? जिसका एक उदाहरण देखने को मिलता है: indira gandhi international airport के निर्माण हेतु ली गयी जमीन |
जनता को बिजली ,शिक्षा  उपलब्ध करवाने हेतु किसानो की जमीन छिनी जा सकती है | बिजली, क्यों ? सिंचाई के लिए ! किसकी सिंचाई ? वो जमीन जो किसी निजी कंपनी के अधिकार में है ,लेकिन आप चिंतित मत होयिए आपको मुआवजा मिलेगा आपकी जमीन के बदले लेकिन शर्त है कीमत वही मिलेगी जो सरकार को उचित लगेगी | किसानो से PPP के नाम पर जमीन ली जाएगी तथा विकास हेतु विदेशी कम्पनीज को आमंत्रित किया जाएगा SEZ(special economic zone) के तहत |There were about 143 SEZs (as of June 2012) operating throughout India, by June 2013 this had risen to 173.[15] 634 SEZs have been approved for implementation by theGovernment of India (as of June 2012).[16]
(स्त्रोत wiki)
SEZ के तहत कम्पनीज को टैक्स में छूट मिलेगी ताकि वो इन्वेस्ट कर सकें जिससे देश का विकास होगा ,लेकिन अमरीका ,जापान जैसे विकसित देशों में ये कम्पनीज नही है |ओह्ह ! मैं भूल गया था की वो विकसित हैं उन्हें तो और विकास की जरुरत नही वहां किसान नही हैं जिनकी जमीन वो छीन सकें |
ये कम्पनीज अपने नियम खुद बनाती हैं तथा इनके किसी भी नियम में उस देश की सरकार का कोई हस्तक्षेप नही होगा |कंपनी के अधिकार में आने वाले क्षेत्र में हुए कोई भी अपराध में स्थानीय पुलिस दखल नही दे सकती (अपराध किसी भी दर्जे का हो :बलात्कार ,हत्या )|मतलब यदि कंपनी की फ़ौज के आदमी हमारे देश की किसी महिला का बलात्कार करें तो दोषियों को सजा कंपनी का कानून देगा लेकिन अच्छा है अपना तो कानून ही अँधा है |
मेरा आशय किसी सरकार पर आक्षेप करना नही है |मेरा बस एक सवाल है विकास किसका ? अमीरों का या गरीबों का या देश का ?वैसे अपने देश में तो गरीब बहुत हैं |किसानो का देश भारत विकासौन्मुख !


Monday, 29 December 2014



                                           नववर्ष
                       दीपक राग़  तू आज गा
                          कितनी बत्तियाँ नववर्ष पर जलाएगा ?
                         उस  झोले में फिर से दर्द समाएगा |

                      वो  भी पूजेंगे अपने देव को
                        फिर से आतंक पीठ सहालायेगा  |
                     गला भर्रायेगा , रूहें कापेंगी
                    शालाओं , सड़कों पर
                          फिर लाशें तांडव नाचेंगी |

                       फिर नववर्ष आएगा
                     फिर लहू टपकेगा लेखनी से
                      फिर उस झोले में  दर्द समा पायेगा ?
                     

Sunday, 23 November 2014

बचपना


           
                                    नई किताब के पन्नों में
                                         खुशबू  ढूंढा करते थे |
                                   कुबेर ख़जाने सा मोरपंख संजोया करते थे |
                                       उड़ते जहाज के गिरने का ख़्वाब पाला  करते थे |
                                 
                                   बचपन में परियों के सपने देखा करते थे ,
                                    अब ख्वाबों  में बचपन देखा करते हैं |
                                   तरुणाई में अक्सर ,
                                             हम  बचपन याद किया करते हैं |
                               

Thursday, 6 November 2014


                  कुछ होंगे उनमे भी ?
                    जो मोमबत्ती जलाने आये थे |

                   उसकी शहादत को सलाम करने
                      या ......
                धुंधली  रोशनी में फिर से कोई
                    'निर्भया ' बनाने ?

Thursday, 25 September 2014

संसद


                  संसद में बिल पास किया जाना था ,
                   मुद्दा महंगाई को मिटाना था |

               विपक्ष  का कहना था ,
                     नफ़ा नही नुकसान होगा |
               पक्ष बोला बिल पास किया जाये ,
              वरना संसद की जगह कब्रिस्थान होगा |
             विपक्ष को बात कचोट गयी |
       इधर से टेबल , उधर से कुर्सी फेंकी गयी |

             कल नया बिल पास किया जाएगा ,
                 टैक्स बढाकर  ,
             संसद में नया फर्नीचर लगवाया  जायेगा |

Wednesday, 17 September 2014

अवार्ड


     फिल्म शूट की जा रही थी ,
        दृश्य था , भीख |

    भिखारी लाया गया |
  अच्छा किया था उसने ,
   सौ रूपये में !!!!

अब हीरो की कमीज फाडू एंट्री थी |
    चार कमीज फाड़े गए ,
 सीन में जान डालनी थी |

  सुबह खबर मिली |
शहर में एक भिखारी ठण्ड से मर गया |

     फिल्म अवार्ड जीत गयी |
  अच्छे सामाजिक चित्रण के लिए |

Saturday, 6 September 2014

समाज बनाम सलाखें


 
         एक रोज सपने में, हम बड़े  आदमी बन गए |
       ज़ोश में जज्बाती हो कुछ भूल कर गए |

         ज्यादा कुछ नहीं,
      महिला सुरक्षा पर  समाज को ज़िम्मेदार ठहरा दिया |
       हम मुख्य समाचारों में छपे थे ,
      आलोचकों ,मीडिया के पौ बारह थे |

       सुना सामाजिक क्रांति होगी ,
           हमारे पाप की सजा मौत से भी बड़ी होगी  |
   
        कामगार काम छोड़ सड़क पर उतर आये |
     लालबत्ती में बैठे महाशय हाथ हिला कर चले गए |

     मंत्री जी की नसीहत मिली ...
   तुम्हे बोलने की तमीज नहीं ,
         औकात क्या है तुम्हारी |
    जितना हमारा कच्छा , उतनी तुम्हारी कमीज नहीं |

    बाज़ार बंद हुए ,जाम लगे ,एम्बुलेंस अटकी ,
     दंगे फिर बलात्कार  भी हुए |
   हम सलाखों के अन्दर हुए |

    पर सलाखें मजबूत थी ,
       समाज से ........|

Saturday, 16 August 2014

असमंजस


                                     अकूत दरिया हैं ,
                              जाने किस ओर बह जाऊं |
                        सागर से मिलने के वहम में ,
                             डरता हूँ , ना डूब जाऊं |

                    खिलती  कलियाँ देख ,बनकर मधुकर
                              मचल जाऊं |
                    मौत के करीब जा ,
                               सासों की कीमत  जान आऊ |
                    पर डरता हूँ ........
                     शायद ही फिर  सोती कल्पनाओं को जगा पाऊं 

Saturday, 29 March 2014

ममता

           

                                    बवंडर की लहरों सी विपदाओं को ललकारती,
                                    वात्सल्य का घूंट पी मेरी कविताई में झलकती ,
                                    छोटी दुत्कार के पीछे छुपी सागर सी ममता आज भी याद आती है |

                                   
                                    जन्नत की चाह नहीं मुझे , तेरी ममता तले बसेरा मिले |
                                    तेरी ममता वास्ते जग से झगड जाऊंगा  ,
                                    पर डरता हूँ माँ ,
                                    वापस लौट पाऊंगा ??
                                    मुझे न पा वह  भी तो तडपती होगी ?
                                    मुझे ढूंढती होगी ?
                                    भटकती होगी ?

                                    मुझे संदेह है माँ !!
                                   क्या तेरी ममता का किनारा है ?
                                   जवाब नहीं आया |
                                   तुझे ढूंढती ममता को , इतनी फुर्सत कहाँ |

                                  मै तो स्वार्थी हूँ ,
                                  मुझे अपनी ही चिंता सताती है |
                                  माँ!!!!
                                  अन्धकार के पीछे छुपी ज्योति सी ममता आज भी याद आती है |


                                मुझे बुढ़ापा आ गया |
                                ममता को  ज़रा भी जरा नहीं आया !!
                                तपस्विनी है वह ,
                                मुझे खोजती , मेरे इर्द-गिर्द ही भटकती होगी ?
                                मै पहचान नहीं पाया,
                                शायद पास की नजर कमजोर है मेरी |


                              जीवन का अंतिम छोर है ये |
                              अब तो ज़िन्दगी भी शूल बनकर सालती है |
                              पर तेरी ममता आज भी याद आती है |


                              मै मिट जाऊंगा |
                             ज़िन्दा रहेगी तेरी ममता |
                             वह अमिट अजर  अमर तेरा साया बनकर मुझे ढूंढती रहेगी |
                             माँ !
                             तेरी ममता मुझे मिटने के बाद भी याद आएगी |                               

Tuesday, 11 March 2014

आत्महत्या



                                         
                           
                               रेलगाड़ी गुजर जाएगी ,
                                  कल फिर आएगी  |
                            चर्चा चार दिन होगी ,फिर दुनिया भी भूल जाएगी |

           
                             निर्मूल हो जायेंगी आशाएँ ,
                                    कुल कलंकित होगा ,
                              कल का इज्जतदार कुल  कल को अपमानित होगा |

                       
                            अब भी नहीं पिघला तू ?...
                           तो तू शायद मनुज नहीं |
                            कर रहा है आज जो तू , करेंगे तेरे अनुज  वही |


                             आत्मघात है यह , कोई समाधान नहीं |
                             किसके जीवन में व्यवधान नहीं  ?

                              लौट आ भव में |
                              राह ,राहगीर ढूंढ  रहे |
                             चेतना तो नहीं होगी शव में
                                  हो सकता है .......
                              कल शव को चेतना की कमी खले |





                                       

Monday, 3 March 2014



                                           

                                                     सोच 


                                   कभी सरिता सी बह ,
                                                    प्यास बुझाती है
                                   उफान ले तांडव करती है ,
                                                    पर नूतन राह भी खोजती है |

                           
                                 खुद में खुद को न पा  मचलती है ,
                                           मेघ बन बरसती है ,
                                                  मुझसे खेलती है ,
               
                         
                                      हँसती  है ,
                                          रोती  है , फिर खुद को ही दुलारती है |
                                        वह सव्यंभू  नहीं  |
                                     वजूद खो देता हूँ , जब बिछड़ती  है |


                                  माना सोच शरारती है ,
                                      पर शरारत में शराफ़त भी है |




                    
                                                             

Wednesday, 26 February 2014



                                                      हॉल 2  भोजनालय (mess)                                    


              एक रजनी सपने में ,
                             जिव्हा भिन्न व्यंजनों का स्वाद ले रही थी |
             किसी  ने दस्तक दी बोला ,
                                             तेरे दर पर मौला आया है |
              हमने कहा  छोड़ यार बिस्तर छोड़ने का मन नहीं
                     अभी छौला - भटूरा  खाया है |
         
                   
               फिर याद आया ........
                    अरे ! मैं छात्रावास  द्वितीय का छात्र हूँ |
                     जहाँ  भटूरे मे तेल  तला जाता है   |

                दाल में जीरा होता है ,पर काला कुछ ज्यादा होता है  |
               यहाँ  हर दिन आलू  जिंदाबाद,
                          हमें  सेहत की फ़िक्र नहीं  यारों
                      पर  आलू भी क्यों करते हो बर्बाद  |

         
             अलार्म  बजता है ......
                              अब  सोने क्लास में जाना है ,
                                         पर जरा संभल के  राह में हॉल 2 मेस पड़ता है |
           
                         
                     

                    

Friday, 31 January 2014

ईंट




                                
                   आज चलते रस्ते ठोकर लगी |
                         पैर से लहू  के बजाय ,
                       माथे से विचारधारा बहने लगी |
                  क्योंकि जब नीचे देखा मैंने ,
                        तो राह में पड़ी वह ईंट मुझे ही उलाहना देने लगी |

            यूँ  तो मानव होने का घमंड था मुझे अपने पर,
                    पर आज पता नहीं क्यों मानवता ही मुझे धिक्कारने लगी  ?
            मै स्तब्ध था , मुझे ये क्या हो गया
                         राह चलते  क्यों मै इंसानियत से झगड़ गया |
             रे मूर्ख ! इंसानियत से तो कोई भी जीत नहीं पाया |
                    मन ने लताड़ा मुझे......
      कहने  लगा दुनिया तेरे बाप की जागीर तो नहीं
             जो तू परवाह करे इसकी |
              कंही ओर है तेरी मंजिल ,जो तेरी राह देख रही |
   अभी कदम बढ़ाना ही चाहा था, की ईंट फिर से पूंछ पड़ी |
           क्या टिकी है आज तक वह मंजिल ?
                  जिसकी नीव की ईंट मजबूत नहीं  |
     मेरा उठता कदम ठहर गया |
           मन तो  अब शांत  हो गया ,
            पर शायद अब दिल की बारी थी |
               सवाल जवाब की मुठबेड भी जारी  थी |
           ईंट पूंछ रही थी मुझ से  ,
                    क्यों बाजार में ग्राहक बिक रहा था ?
                 क्यों  बाजार में नारी बिक रही थी ?
               क्यों  आतंक फ़ैल रहा था  ?
                  क्यों जनता महंगाई की मारी थी  ?
             
                           उस ईंट की प्रतिभा देख मन हुआ             
                उठा कर  चूम लूँ  उसे |
                  पर डर गया ,
             कही कोई देख ना ले मुझे |


Tuesday, 28 January 2014


                 
                                               
                                           दीपक की तलाश
                                           

                                    आज भोर भई तो देखा , भानू  भी ले रहा जम्हाई  था |
          कुछ और  भी था इससे जयादा
                                           कोई तरुण खो गया  तरुणाई  था |

             दिनकर  दिन  कर  गया
                   लग  रहा था  आज  भास्कर की किरणों  में  कोई धीमा  गरल समां गया  |
            तृण  तर  तो था ओंस  से  ,
                    पर उससे भी  गायब  थी नमी  |
            पास  से   चिड़िया कोई कोलाहल  कर गुजर गयी
                         पर  !  जागने के बजाय  थककर आज  नींद  भी  सो गयी |

         कालचक्र  जीत   गया  ताकि  ,
                             सांझ   कोई  ढल सके
                पर  तलाश  बाकी  थी  अभी , 
                        उस  दीपक की   जो  डूबते  धुंधले से  सूरज को  रोशनी  दे सके |
          

Saturday, 18 January 2014

N.C.C के जूते




                         एक रोज राहत रहम कर गई
                        पर ......
                              विधि का चाहना कुछ ओर ही था |
                     सुना विंग में किसी बन्दे  को बंदी मिल गई !
                 

                    G.P.L  फिक्स हो गई , अब बकरा हलाल होने वाला था ,
                        छुर्रियों  पर धार तेज  हो गई |
                   हमारे  लिए तो G.P.L  पर , बन्दे की दो रातों की नींद  हराम  हो  गई |

               
                               हम तो थक कर थम गए
                     पर  बन्दे की अब बारी थी ,  वह बोला........
                           मेरे अकेले की लेने को  ये कैसी मारामारी  थी ?


                              वह  तो राह चलती कन्या थी |
                                       जो  लाइब्रेरी का पता पूंछ  
                                          थैंक्यू  भय्या  ! बोली थी  |

                            हमें  लगा ये तो बड़ी भूल हो गई
                            सय्यां  पर जाती बात भय्या पर आ गई  |

                    पर  हम खुश थे |
                                      चलो इसी बहाने  N.C.C के जूतों की धूल झड  गई |
 
                               

Sunday, 12 January 2014

भीगा बारूद


                                         
        बारूद की फैक्ट्री में गोले बनाये जा रहे थे | कुछ किसी पर आग बरसाने हेतु तो कुछ चट्टाने तोड़ने हेतु |
   बारूद  का  हर कण खुश  था, अपनी किस्मत पर  ओर होता भी क्यों नहीं , उसे(बारूद का कण ) एक  मंच
  जो  मिल गया था अपनी ऊर्जा ,अपना अस्तित्व  सिद्ध करने के लिए |

    फैक्ट्री में विस्फोटक बनाने का काम बढता जा रहा था | रोज नयी बारूद आ रही थी ,नए अन्वेषण  हो रहे
थे |  इसी  बीच  एक मुठ्ठी बारूद  बिखरकर  दूर  गिर गयी थी |  हवा  का हर एक झोंका  बारूद  की उस मुठ्ठी
  को उसके गंतव्य  तक  पहुचाने  की कोशिश  कर रहा था लेकिन उसे शायद अपने होने का ज्ञान ही नहीं  था |
 वह  पहचान नहीं पा रही  थी , अपनी  ऊर्जा को ,अपने आप को | हवा के अनगिनत  झोंके  उस के  पास से गुजर गए  लेकिन बारूद इन सबसे  बेखबर थी |

एक  रोज  तेज  बरसात हुई, बारूद भीग चुकी थी | वह अपना  अस्तित्व खो चुकी थी | दूसरी तरफ कुछ बारूद
 गोले में  तब्दील हो  चुकी थी, अपने आप को साबित करने के लिए |